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आराधना

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  आराधना" विषय पर प्रस्तुत शानदार अभिव्यक्तियों में जिन दो रचनाओं का मैंने आज चयन किया है, वे क्रमशः साधना मिश्रा जी और शोभा ठाकुर जी की हृदयग्राही रचना है - *आराधना* / उपासना/ साधना उपासना तक जाने के हेतु पहले करनी होती आराधना प्रभु तक जाने का प्रथम मार्ग , माना जाता है आराधना दूजा मार्ग यही बतलाता इष्टदेव के निकट बैठना नित मन को संयत ,करना, है कहलाता उपासना अभ्यास निरन्तर उन दोनों का मानी जाती है साधना साधना के बिना सिद्धि मिलती नहीं इसलिए आओ मिलकर करें साधना, मन को करें निर्मल, गंग के नीर सा , श्वास प्रति श्वास करने लगे आराधना आराधना से जब शीश झुकने लगे उद्देश्य जब सम्पूर्ण सधने लगे बिगड़े सभी कार्य बनने लगे मन प्रफुल्लित सदा जब रहने लगे तो उपासना का हम करें अभ्यास स्व इष्ट निकट बैठ मिलता सुकून जब चरणों की रज का हो आभास समझ लो अब यही समय आ गया साधना की साध अब सधने लगी मन तरंगित हो कुशल तार बजने लगे हर अभियान मे सिद्धि मिलने लगे समझ लो , साधना सफल हो गयी साधना की साध अब सधने लगी इष्ट से मन के तार जुड़ने लगे ,तो "साधना" साधना की सफल हो गयी। "साधन...

2021

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  2021 पर कम पोस्ट आये, जो आये उसमें सबसे प्रभावशाली जो दो रचना मुझे लगी वह क्रम से बिन्दु त्रिपाठी जी और निरुपमा खरे जी की है - *याद तो आओगे* नव वर्ष के रूप मे गत वर्ष किया था स्वागत । कतरा कतरा बीत गए तुम, कुछ खुशियाँ कुछ दे कर ग़म । पहले से ही जूझ रहे थे, इक वैश्विक महामारी से । सोचा था कुछ राहत होगी, इसी लिए तो झोंक दिया था खुद को नववर्ष के स्वागत की तैयारी मे । पूजा पाठ और जप तप कर के ईश्वर का आव्हान किया । किंचित प्रभु ने सुना और फिर वैक्सीन ईजाद हुई । नव वर्ष का मिला उपहार और विपदा भी कुछ कम तो हुई पर , ।कितने अपने ही लोगों को हमने अब तक खोया है लेकिन कुछ पाया भी हमने गत वर्ष की झोली से । आजादी का खूब मनाया हम सब ने अमृत महोत्सव वैक्सीन के मुफ्त डोज से, हुए बहुत जन आज सुरक्षित । ओलंपिक के मैदानों से, पदक भी खूब बटोरे । नयी शिक्षा नीति भी अपने उपहारों के खाते मे आई । अन्न दाता भी हुआ सुरक्षित, कृषक कानून जब आए । ईश्वर से है यही प्रार्थना आने वाला नव वर्ष भी खुशियाँ ले कर आए । बिन्दु त्रिपाठी भोपाल लो बीत चला एक और साल देकर खट्टी-मीठी यादें बेशुमार कल ही तो दीवारों पर सजे थे ...

चित्र आधारित रचना

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  एक चित्र दिया शेफ़ालिका जी ने और भावों का सैलाब उमड़ा, अभिव्यक्तियों ने चित्र को जीवंत किया । आज की रचनाओं में जो दो रचना ब्लॉग पर लेने जा रही हूँ, वह है - सुविधाओं की हमको दरकार नही, जी लेते हर हाल मे हम पर मानी हमने हार नही । नही नसीब हो भोजन यदि तो, पानी ही पी लेते हैं । जैसे भी रखता है रखवाला, बस वैसे ही जी लेते हैं । सुबह सबेरे सर पर रख कर, केवल पानी की दो बोतल । चल पड़ते रोजी की तलाश मे, तभी जलेगा घर मे चूल्हा, जीते हैं बस इसी आस मे । सुख सुविधा की हमको चाह नही, एक वक्त की रोटी हो बस, दूजे की परवाह नही । जंगल की राह पकड़ लेते हैं, सुबह सबेरे हम हर रोज । थक हार कर पानी पी कर । कुछ पल लेते पेड़ों की ठौर । अगले ही क्षण पुनः निकलते, जंगल से लकड़ी लाने को । घर मे नन्हे मुन्ने बच्चों के भूखे पेट की आग बुझाने को । बिन्दु त्रिपाठी भोपाल मेहनतकश माथे पर स्वेद कणों का श्रृंगार सजाए वो श्रमिक स्त्री सुगठित देह और दमकती त्वचा कितनी खूबसूरत लग रही है उसे कहां दरकार है सौंदर्य प्रसाधन की उसके होंठों की हंसी और आंखों की चमक गवाही देती है उसके आंतरिक आनंद की कठिन श्रम से उपजा है ये निर्मल आन...

भूल* से जुड़ी भूली बातें

  त्योहारों की धूम थी तो कमोबेश हम सब पटल से दूर थे, एक कमी थी, पर समयानुसार कमी महसूस करते हुए हम दूसरी गतिविधियों में रम जाते हैं - मैं भी रम गई थी, पर यकीनन इस पटल को भूली नहीं थी । हाँ, लेकिन बाकी चीज मैं भूलती बहुत हूँ, जैसे बुधवार, चूल्हे पर कुछ रखकर, कुछ लिखते हुए !!! तो आज भूलने को ही विषय बनाते हैं और लिखते हैं इस *भूल* से जुड़ी भूली बातें रश्मि प्रभा अनुपमा अनुश्री  - रे आदमकद ! हो गया है तू कितना बौना! तुझे हर वक़्त चाहिए सुख सुविधाओं का बिछौना! भूल गया है तू इस पुण्य धरा में कहांँ-कहांँ महान सभ्यता- संस्कृति के गौरव चिन्ह छुपे हुए हैं अपने मन से पूछ क्या तूने कभी खोजें हैं! अधुनातन रंग में रंग गया है जड़ों को खोखला कर के अकेलेपन में ढ़ल गया है! दिखावे का और भटकाव का मार्ग अपनाकर तू ख़ुद को भूल गया है। कण-कण है जिसकी शक्ति से गतिमान कभी गहराई में उतर ख़ुद ही हो जाएगी उससे पहचान यूंँ भोग विलास, बनावट का बजाकर तंबूरा काल का भोग बनता जा रहा भूलकर अपना अस्तित्व पूरा! इस नकलीपन को कहीं फेंक दे! पहनकर सच का चोला शांँति ,सुकून, प्रेम की त्रिवेणी में झूल झूला।...

लक्ष्मी का आह्वान है

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दिवाली की जगमग रौशनी और उलूक ध्वनि -  मिट्टी के तन में चेतना की वर्तिका कंचन सी बनती है और देवालय की उजास हमारे सम्पूर्ण व्यक्तित्व को आलोकित करती है  ...  प्रेमदीप यूं तो मिलते हैं दीप मिट्टी के लाखों इस दुनिया में यत्र तत्र सर्वत्र देते हैं खुशियां अपार जलाए जाते हैं ये हर खुशी के अवसर पर नित्य प्रति घर-घर में सायं प्रातः द्योतक है ये उजाले के तम को हरते प्रकाश के दोषों का शमन करती शक्ति के महसूस किया है मैंने जलते दीपों के आलोक को मां की ममतामयी आंखों में मासूम अबोध बच्चे की टिमटिमाती आंखों में गुरु की आशीर्वाद देती भावों से भरपूर भावभीनी आंखों में बागों में खिलखिलाते चमकते दमकते रंग बिरंगे फूलों में आकाश से नेह बरसाती चांदनी की शीतल फुहारों में रंग बिरंगी चटक रंगों की ओढनी पहने सोलह श्रृंगार करती नवयौवना के मादक सौंदर्य में सरोवर में स्नान करते  क्रीडामग्न श्वेत हंसों के मध्य खिले श्वेत कमलों में हाथों में आलता लगाए पुष्पगुच्छ समर्पित करती अट्टालिकाओं पर चढ़ती उतरती रुनझुन करती ,दीप जलाती कामिनी के सौंदर्य में खिलखिलाते बच्चों की श्वेत सुंदर दंत पंक्ति में ज...

।।।सांझी माता ।।

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  । (,पितृपक्ष में मनाती है कुवांरी कन्या )  श्रीमती उषा चतुर्वेदी सांझी माता का पर्व भाद्रपद की पूर्णिमा से अश्विन मास की अमावस्या तक होता है यह पर्व विशेषकर कुंवारी कन्याओं का होता है यह पूरे पितृपक्ष के 16 दिनों तक चल.ता है सांझी माता का पर्व विशेषकर ब्रज क्षेत्र राजस्थान बुंदेलखंड गुजरात मालवा निमाड़ मैं मनाया जाता है। सांझी माता को ब्रज क्षेत्र में चंदा तरैया कहते हैं ब्रज क्षेत्र के( भदावर) आगरा मथुरा बटेश्वर तथा आगरा जिले के बाह तहसील के गांव में ब्रज भाषा बोलने के कारण ही चंदा तरैयां कहलाता है। कुंवारी कन्याएं 16 दिनों तक घर के बाहर दरवाजे के पास वाली दीवार पर अथवा घर के अंदर आंगन की दीवाल पर गोबर से विभिन्न आकृतियां बनाती है। 16 दिन अलग-अलग आकृति बनाई जाती है लेकिन सूरज देवता चंद्रमा देवता तथा 7  तारे आवश्यक रूप से रोज बनाए जाते: कुंवारी कन्या है पहले घर के दरवाजे के पास वाली दीवार को चूने से पोत कर पवित्र करती है। उसके बाद उसे गाय के गोबर से लीपती है। उतना ही स्थान लीपती है जितने स्थान पर सांझी माता एवं अन्य चीजें बनाती हैं। जिस स्थान को लिखती है ऊपर एक कोने में ...

*श्राद्ध क्या है*

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  भाद्रपद शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा से सोलह दिवसीय श्राद्ध प्रारंभ होते हैं,  लिहाजा 20 सितंबर से श्राद्ध की शुरुआत हो जाएगी और आश्विन महीने की अमावस्या को यानि 6 अक्टूबर, दिन बुधवार को समाप्त होंगे। श्राद्ध को महालय या पितृपक्ष के नाम से भी जाना जाता है। आचार्य इंदु प्रकाश के मुताबिक, श्राद्ध शब्द श्रद्धा से बना है, जिसका मतलब है पितरों के प्रति श्रद्धा भाव पद्धति हमारे भीतर प्रवाहित रक्त में हमारे पितरों के अंश हैं, जिसके कारण हम उनके ऋणी होते हैं और यही ऋण उतारने के लिए श्राद्ध कर्म किये जाते हैं। आप दूसरे तरीके से भी इस बात को समझ सकते हैं। पिता के जिस शुक्राणु के साथ जीव माता के गर्भ में जाता है, उसमें 84 अंश होते हैं, जिनमें से 28 अंश तो शुक्रधारी पुरुष के खुद के भोजनादि से उपार्जित होते हैं और 56 अंश पूर्व पुरुषों के रहते हैं। उनमें से भी 21 उसके पिता के, 15 अंश पितामह के, 10 अंश प्रपितामह के, 6 अंश चतुर्थ पुरुष के, 3 पंचम पुरुष के और एक षष्ठ पुरुष के होते हैं। इस तरह सात पीढ़ियों तक वंश के सभी पूर्वज़ों के रक्त की एकता रहती है, लिहाजा श्राद्ध या पिंण्डदान मुख्यतः तीन पीढ़...