सुबह से रात तक के सफ़र में, सुबह की बात जितने लोगों की कलम ने की, उसमें किसे भूलूँ, किसे याद करूँ जैसी हालत है । तो आज मैं सबका चयन करती हूँ, सिर्फ एक बेमिसाल रचना को छोड़कर, जो विषय से अलग है । अनुश्री जी (वह तस्वीर ब्लॉग पर लगेगी),शेफालिका जी,आर के तिवारी जी,निरुपमा खरे जी, बिंदु त्रिपाठी जी,उषा चतुर्वेदी जी,मधुलिका सक्सेना जी,रेखा भटनागर जी, साधना मिश्रा जी . . . सबको बधाई । भोर की आहट ****** मन में है उल्लास भरा , नयी सुबह होने को है । दिखीं गई आशा कि किरण , धुँधलका छट जाने को है ॥ मिट्टी पानी हवा धूप की , खाद मिली है प्रकृति को । खिल उठेगी आज धरा भी , सुवासित हो तन मन से । उल्लासित हो चले नर नारी , स्वच्छंद बने उड़ते फिरते । नवसृजन की आस लिये , बढ़े लक्ष्य की ओर चले । तम के बाद छाया उजास, निशा गयी , आ गई भोर ! बंद दरवाज़ों से पड़े निकल , मन में लिये आशा की डोर । शेफालिका श्रीवास्तव भोपाल मतङ्गकेराम ******* "सुबह" की ब्रम्ह बेला है राम का नाम हो जाये मिले जो भी सुधीजन सबसे जै श्री राम हो जाये राम का नाम जपने से जरूरी राम को पाना राम को पाने का मतलब हृदय सियाराम ...
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